• हमारा उद्देश्य

    सारे कुर्मी समाज को इंटरनेट के माध्यम से एक मंच पर लाना, समाज की जानकारी कम समय में अधिक लोगों तक पहुंचाना और इंदौर शहर मे समाज की धर्मशाला बनवाना |

    आपसे आग्रह

    हमें अपने लेख आलेख, कविता, कहानी, सामाजिक गतिविधियां, सामाजिक युवा पीढ़ी की उपलब्धियां, कृषि के क्षेत्र में किए गए हमारे मूलभूत उपलब्धियां, ऐसी हर वो जानकारी जो आप अपने साथ-साथ समाज के आखिरी व्यक्ति तक पहुंचाना चाहते है, सहर्ष आमंत्रित है

    हमारा प्रतीक

    अखिल भारतीय कुर्मी क्षत्रिय महासभा के गठन के 85 वर्ष के लंबे अंतराल के बाद महासभा के 1981 में रायपुर में आयोजित 34वें महाधिवेशन में श्री राजेन्द्र कुमार(प्रचार मंत्री, प्रकाशक, सम्पादक, कुर्मी संदेश, कन्नौज व सम्पादक कुर्मी क्षत्रिय जागरण) द्वारा यह प्रतीक प्रस्तुत किया गया। द्वितीय दिवस के खुले अधिवेशन में विस्तृत विचार विमर्श के बाद, इस प्रतीक को बिना किसी संशोधन के मूल रूप में सर्व सम्मति से स्वीकार कर लिया गया और आज सम्पूर्ण भारत वर्ष में इसे स्वजाति बंधुओं द्वारा अपना लिया गया है।


    प्रतीक के पृष्टभूमि में भूमि को दर्शाया गया है जो हमारे व्यापक भूमिपति होने का द्योतक है, गेंहूं की बालियां हमारे गौरवपूर्ण कृषक होने को प्रदर्शित करती है। दो तलवारें हमारे शौर्य व क्षत्रियत्व की द्योतक है। बालियों एवं तलवारों के मध्य ज्योति, मानव ज्योति है अर्थात इसका सम्पूर्ण आशय है कि हम सर्वप्रथम सभ्य समाज के रूप में इस धरा के स्वामी बनें व हमारी दोनों भुजाओं-बायीं भुजा में हल तथा दाहिनी भुजा में तलवार के मध्य मानव जीवन सुरक्षित है। हम मानव जाति को सुरक्षा एवं पोषण दोनों ही प्रदान करते हैं अर्थात कुर्मी बांधव रक्षक एवं पोषक दोनों है।

    संक्षिप्त परिचय

    कुर्मी क्षत्रिय का आरम्भ: कुर्मी जाति जो कहा जाता है कुर्मी क्षत्रिय हिंदू धर्म की एक शाखा है, कुर्मी का आरम्भ 1488 में हुआ लेकिन 1901 की जनगणना में इसे शामिल किया गया |


    प्रोफेसर यम. विलियम की संस्कृति-अंग्रेजी शब्दकोष में कूर्मी के अर्थ दिए है, अतिशक्तिमान पुरूष वेदों के प्रख्यात भाष्यकार सायण वेदों में आये कथन, तुवि कूर्मि की व्यवस्था करते है, एक ऐसा परमवीर पुरूष जो दुर्लभ से दुर्लभ वीरोचित निपुणता एवं कौशल युद्ध क्षेत्र में प्रदर्षित करने में सक्षम हो, मार्कण्डेय पुराण के कूर्म निवेश-खण्ड में भारत वर्ष का धरातल लेते हुए पूर्वाभिमुख कूर्म अथवा कच्छप के ऊपरी पृष्ठ के समान उत्तल आकार वाला बतलाया है।


    यह अवधारणा भारत की भौगोलिक विशेषताओं संबंधी हमारे वर्तमान ज्ञान से पूर्णत: तर्क संगत है। इनसाइकिलोपिडिया ऑफ ब्रिटानिका (वाल्यूम 13, प्रथम संस्करण, 1929, पृष्ठ 517) के अनुसार कुम्बी का अर्थ है एक गृहस्थ, पश्चिमी भारत की एक महान कृषक जाति वेदोपरान्त काल का संस्कृत शब्द कुटुम्बिक, जो कि आदि शब्द का संस्कृत रूप हो सकता है। यह नाम उत्तर भारत में कूर्मि(कुरमी) रूप में प्रचलित है, जहां इस जाति के लोग गंगा नदी के किनारे-किनारे वाले क्षेत्र में तथा इसके दक्षिणी क्षेत्रों में बहुसंख्या में बसे हुए हैं। इसी जाति के लोगों को गुजरात में कणबी, कनबी तथा महाराष्ट्र तथा मध्य प्रान्त में कुनबी कहा जाता हैं।